ECI विवाद: 14 आपत्तियां, राहुल गांधी का मार्च, आयोग और BJP का जवाब

ECI विवाद: दो चुनाव आयुक्तों की 14 आपत्तियों से क्यों उठे सवाल? जानिए पूरा मामला, BJP और चुनाव आयोग का जवाब

नई दिल्ली | 13 अक्टूबर 2026

भारत के चुनाव आयोग (ECI) को लेकर सितंबर 2026 में एक ऐसा विवाद सामने आया, जिसने चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता, मतदाता सूची में बदलाव और आयोग के भीतर फैसले लेने के तरीके पर सवाल खड़े कर दिए। अंग्रेजी अखबार The Indian Express की एक खोजी रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयोग के तीन सदस्यों में से दो चुनाव आयुक्तों ने पिछले लगभग 10 महीनों में कम-से-कम 14 बार आयोग के कुछ फैसलों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर लिखित आपत्तियाँ दर्ज की थीं।

रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। वहीं, चुनाव आयोग ने कहा कि आयुक्तों के बीच अलग-अलग राय होना सामान्य प्रक्रिया है और उसके अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए। BJP ने भी विपक्ष के आरोपों को राजनीतिक अभियान बताया।

12 अक्टूबर को राहुल गांधी समेत INDIA गठबंधन के नेताओं ने इस विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मार्च किया और चुनाव आयोग से संबंधित मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की मांग करते हुए याचिका दाखिल की।

आखिर यह रिपोर्ट क्या है, इसमें किन मुद्दों पर सवाल उठाए गए और चुनाव आयोग तथा BJP ने क्या जवाब दिया? समझिए पूरा मामला।

ECI विवाद: दो चुनाव आयुक्तों की 14 आपत्तियों से क्यों उठे सवाल? जानिए पूरा मामला, BJP और चुनाव आयोग का जवाब

विवाद की शुरुआत किस रिपोर्ट से हुई?

23 सितंबर 2026 को The Indian Express की पत्रकार रितिका चोपड़ा की खोजी रिपोर्ट प्रकाशित हुई। इसका शीर्षक था—“14 times in 10 months, two Election Commissioners objected on record to poll panel steps।”

रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर कम-से-कम 14 बार औपचारिक आपत्तियाँ दर्ज की थीं। इन आपत्तियों का संबंध मतदाता पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने या बहाल करने, Form 6 में बदलाव और चुनावी डेटा संभालने वाले IT सिस्टम से था।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि दोनों आयुक्तों ने कुछ निर्णयों के बारे में सवाल उठाया कि क्या उन्हें उचित जानकारी और सहमति के बिना लागू किया गया था।

यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि यह चुनाव आयोग की ओर से जारी की गई कोई आधिकारिक जाँच रिपोर्ट नहीं थी। यह पत्रकारिता की जाँच थी, जिसमें अखबार ने आंतरिक नोट्स, पत्राचार और अधिकारियों से मिली जानकारी के आधार पर घटनाक्रम प्रस्तुत किया।

मूल रिपोर्ट: https://indianexpress.com/article/express-exclusive/election-commission-sir-14-objections-gyanesh-kumar-sukhbir-singh-sandhu-vivek-joshi-10889737/

SIR क्या है और इससे विवाद क्यों जुड़ा?

SIR का पूरा नाम Special Intensive Revision है। हिंदी में इसे मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण कहा जा सकता है।

इस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची की जाँच और उसे अद्यतन करना है, ताकि पात्र मतदाताओं के नाम दर्ज रहें और अपात्र या गलत प्रविष्टियों की पहचान की जा सके।

चुनाव आयोग ने जून 2025 में बिहार से इस प्रक्रिया की शुरुआत की। बाद में इसका विस्तार अन्य राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक हुआ।

सितंबर 2026 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की प्रारूप मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए थे। यह संख्या प्रारूप सूचियों में हटाए गए नामों के संदर्भ में थी; इसे बिना अतिरिक्त जाँच के इतने पात्र मतदाताओं के स्थायी रूप से नाम काट दिए जाने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

विवाद इसलिए बढ़ा क्योंकि विपक्ष ने सवाल उठाया कि क्या इस प्रक्रिया में पात्र मतदाताओं के नाम भी हटाए गए। चुनाव आयोग का पक्ष है कि मतदाता सूची की जाँच और सुधार चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा है।

यहाँ दो सवाल अलग-अलग हैं: मतदाता सूची की जाँच करना कितना आवश्यक है और उस जाँच में प्रत्येक मतदाता के अधिकारों की सुरक्षा किस तरह सुनिश्चित की गई।

दोनों चुनाव आयुक्तों ने किन मुद्दों पर आपत्ति जताई?

Form 6 में बदलाव

Form 6 का इस्तेमाल पात्र नागरिकों द्वारा मतदाता सूची में नया नाम दर्ज कराने के लिए किया जाता है।

The Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई 2026 में ऑनलाइन Form 6 में SIR से जुड़ा एक सवाल जोड़ा गया। आवेदक से पूछा जाने लगा कि क्या वह या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी पिछली SIR की मतदाता सूची में मौजूद थे।

रिपोर्ट में बताया गया कि इस बदलाव के कानूनी आधार पर सवाल उठे। विवेक जोशी ने मई 2026 में इस विषय पर आपत्ति दर्ज की थी। सुखबीर सिंह संधू ने 13 अगस्त को बदलाव को अनधिकृत और गैरकानूनी बताया।

इसका मतलब यह नहीं कि अदालत ने पूरे Form 6 को अवैध घोषित कर दिया था। विवाद इस बात पर था कि निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत फॉर्म में ऐसा बदलाव करने का अधिकार और आधार क्या था।

चुनावी डेटा और IT सिस्टम

दूसरा प्रमुख मुद्दा मतदाता सूची से संबंधित डेटा और सॉफ्टवेयर के नियंत्रण का था।

रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्तों ने प्रशासनिक जिम्मेदारियों में बदलाव और IT व्यवस्था पर निगरानी को लेकर सवाल उठाए। उनका कहना था कि कुछ बदलावों से मतदाता डेटा की देखरेख और अधिकारियों के बीच नियंत्रण की व्यवस्था प्रभावित हो सकती थी।

यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मतदाता सूची का डेटा सही रखना, उसमें बदलावों का रिकॉर्ड सुरक्षित रखना और अधिकृत अधिकारियों को उचित पहुँच देना चुनावी प्रशासन के आवश्यक हिस्से हैं।

हालाँकि, रिपोर्ट में उठाए गए सवालों से अपने-आप यह साबित नहीं होता कि डेटा में जानबूझकर छेड़छाड़ हुई थी।

पश्चिम बंगाल में अपीलों का मामला

रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़े मामलों में अपील दाखिल किए जाने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए।

मुख्य चिंता यह थी कि मतदाता सूची से संबंधित कुछ आदेशों के विरुद्ध अपील किसके अधिकार से दाखिल की गई और संबंधित प्रक्रियाओं की मंजूरी किस तरह हुई।

यदि किसी मतदाता का नाम बहाल किया जाता है या हटाने के आदेश को चुनौती दी जाती है, तो उस प्रक्रिया का कानूनी आधार और दस्तावेजी रिकॉर्ड स्पष्ट होना चाहिए। इसी कारण इस मुद्दे को आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया से जोड़कर देखा गया।

आयोग के भीतर फैसले लेने का तरीका

रिपोर्ट के अनुसार, संधू और जोशी ने कुछ मामलों में कहा कि निर्णय या प्रशासनिक आदेश जारी होने से पहले उन्हें पर्याप्त जानकारी नहीं दी गई थी।

इन आपत्तियों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि सवाल केवल किसी एक फॉर्म या एक राज्य तक सीमित नहीं थे। वे इस बात से भी जुड़े थे कि तीन सदस्यीय संवैधानिक संस्था में फैसले किस प्रक्रिया से लिए जा रहे थे।

घटनाक्रम की पूरी टाइमलाइन

  • जून 2025: बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की शुरुआत हुई।
  • मई 2026: रिपोर्ट के अनुसार, विवेक जोशी ने Form 6 में SIR से संबंधित बदलाव के कानूनी आधार पर सवाल उठाया।
  • जुलाई 2026: ऑनलाइन Form 6 में पिछली SIR की मतदाता सूची से संबंधित सवाल जोड़े जाने का मुद्दा सामने आया।
  • 13 अगस्त 2026: सुखबीर सिंह संधू ने इस बदलाव को अनधिकृत और गैरकानूनी बताते हुए आपत्ति दर्ज की।
  • 9 सितंबर 2026: तीनों चुनाव आयुक्तों की पूर्ण बैठक हुई। रिपोर्ट के अनुसार, यह लगभग चार महीने बाद ऐसी पहली बैठक थी।
  • 23 सितंबर 2026: रितिका चोपड़ा की खोजी रिपोर्ट प्रकाशित हुई और विवाद राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया।
  • 23–24 सितंबर 2026: चुनाव आयोग ने जवाब दिया कि अलग-अलग राय निर्णय लेने की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए। BJP ने भी विपक्ष के आरोपों का विरोध किया।
  • 26 सितंबर 2026: आयोग ने मतदाताओं की सुविधा और IT व्यवस्था की समीक्षा से जुड़े कदमों की घोषणा की।
  • 30 सितंबर 2026 के आसपास: SIR पूरा कर चुके राज्यों में ऑनलाइन Form 6 से संबंधित घोषणा हटाए जाने की खबरें सामने आईं।
  • अक्टूबर 2026 का पहला सप्ताह: Form 6 और SIR से जुड़े कानूनी सवालों पर सुप्रीम कोर्ट में कार्यवाही हुई। अदालत में किसी विषय पर सवाल उठना और पूरे मामले पर अंतिम फैसला आना अलग बातें हैं।
  • 12 अक्टूबर 2026: राहुल गांधी और INDIA गठबंधन के नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च किया। विपक्षी नेताओं की ओर से चुनाव आयोग से जुड़े मुद्दों पर याचिका दाखिल की गई।
  • 13 अक्टूबर 2026: इस रिपोर्ट की तारीख तक विवाद के मुख्य सवालों पर चुनाव आयोग, BJP और विपक्ष के बीच मतभेद बने हुए थे।

चुनाव आयोग ने क्या जवाब दिया?

खोजी रिपोर्ट के सामने आने के बाद चुनाव आयोग ने कहा कि आयोग के भीतर अलग-अलग राय, सुझाव और लिखित टिप्पणियाँ निर्णय लेने की प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं।

आयोग के जवाब के मुख्य बिंदु थे:

  • पिछले एक साल में लिए गए अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
  • आयुक्तों की लिखित टिप्पणियों को संस्थागत निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा समझना चाहिए।
  • आयोग के आदेश कानूनी प्रक्रिया के अनुसार जारी किए गए।
  • चुनावी डेटा और IT सिस्टम की सुरक्षा के लिए आवश्यक प्रोटोकॉल मौजूद हैं।

हालाँकि, The Indian Express की फॉलो-अप रिपोर्ट में कहा गया कि आयोग ने अपने जवाब में सभी विशिष्ट सवालों का विस्तृत समाधान नहीं दिया। उदाहरण के लिए, Form 6 में बदलाव किसने मंजूर किया और पश्चिम बंगाल में कुछ अपीलें किसके अधिकार से दाखिल हुईं, इन सवालों पर स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई।

इसलिए आयोग का जवाब और पत्रकारिता रिपोर्ट में उठाए गए सवाल, दोनों को साथ पढ़ना जरूरी है।

BJP ने क्या कहा?

23 सितंबर को प्रकाशित रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए BJP सांसद संबित पात्रा ने विपक्ष के आरोपों को राजनीतिक अभियान बताया।

BJP का तर्क था कि चुनाव आयोग के भीतर अलग-अलग राय होना लोकतांत्रिक व्यवस्था में असामान्य नहीं है। पार्टी ने कहा कि आंतरिक मतभेदों के आधार पर पूरे आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना उचित नहीं है।

BJP ने यह भी कहा कि विपक्ष संवैधानिक संस्थाओं को निशाना बना रहा है और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग राजनीतिक उद्देश्य से की जा रही है।

पार्टी ने पश्चिम बंगाल के चुनावी आँकड़ों का भी उल्लेख किया। उसका तर्क था कि जिन निर्वाचन क्षेत्रों में SIR के दौरान अधिक नाम हटाए गए, उनमें भी तृणमूल कांग्रेस ने कई सीटें जीतीं। BJP ने इसे इस आरोप के विरुद्ध तर्क के तौर पर पेश किया कि SIR का लाभ केवल BJP को हुआ।

लेकिन इस तर्क की एक सीमा है। किसी निर्वाचन क्षेत्र में कौन-सी पार्टी जीती, इससे यह साबित नहीं होता कि मतदाता सूची से हटाया गया प्रत्येक नाम सही था या गलत। इसके लिए संबंधित मतदाताओं की पात्रता, नोटिस, दस्तावेज और अपीलों के रिकॉर्ड की जाँच आवश्यक है।

विपक्ष क्या चाहता है?

विपक्ष का कहना है कि SIR के दौरान पात्र मतदाताओं के नाम हटाए जाने और आयोग के भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया से जुड़े सवालों की स्वतंत्र जाँच होनी चाहिए।

12 अक्टूबर को दाखिल याचिका और विरोध-प्रदर्शन में सामने आई प्रमुख माँगों में शामिल हैं:

  • चुनाव आयोग के संबंधित आंतरिक रिकॉर्ड और निर्णय प्रक्रिया की जानकारी सार्वजनिक की जाए।
  • मतदाता सूची में नाम हटाने की प्रक्रिया पारदर्शी हो और पात्र मतदाताओं को उचित अवसर मिले।
  • SIR से संबंधित डेटा का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए।
  • मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं की जाँच के लिए स्वतंत्र व्यवस्था बनाई जाए।
  • मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका की जाँच हो और उनके इस्तीफे की मांग पर विचार किया जाए।

ये विपक्ष की माँगें हैं। याचिका दाखिल किए जाने को अदालत द्वारा सभी आरोप स्वीकार किए जाने या राहत मंजूर किए जाने के बराबर नहीं समझना चाहिए।

 क्या इस रिपोर्ट से चुनाव में गड़बड़ी साबित हो गई?

इस सवाल का जवाब देने के लिए तीन अलग-अलग स्तरों को समझना होगा।

पहला: क्या आयुक्तों ने आपत्तियाँ दर्ज की थीं?

The Indian Express की रिपोर्ट में दस्तावेजों के आधार पर कम-से-कम 14 आपत्तियों का उल्लेख किया गया। चुनाव आयोग ने इन टिप्पणियों के अस्तित्व को नकारने के बजाय उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा बताया।

दूसरा: क्या प्रशासनिक या कानूनी प्रक्रिया में गलती हुई?

यह एक अलग सवाल है। इसके लिए Form 6 में बदलाव की मंजूरी, संबंधित नियमों, आदेशों, डेटा की पहुँच और अपीलों के रिकॉर्ड की जाँच जरूरी है। रिपोर्ट में उठाए गए सवाल गंभीर हैं, लेकिन हर सवाल का अंतिम कानूनी निष्कर्ष अलग से स्थापित होना चाहिए।

तीसरा: क्या जानबूझकर मतदाताओं के नाम हटाए गए या किसी पार्टी को फायदा पहुँचाया गया?

इस निष्कर्ष के लिए केवल आयुक्तों की आपत्तियाँ या चुनावी परिणाम पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए पात्र मतदाताओं के नाम हटने के प्रमाण, संबंधित अधिकारियों के निर्णय, अपीलों के परिणाम और अन्य ठोस साक्ष्य चाहिए।

इसी तरह, आयोग का यह कहना कि फैसले सर्वसम्मति से लिए गए, अपने-आप में हर प्रशासनिक कार्रवाई की वैधता का स्वतंत्र प्रमाण नहीं है। विशिष्ट आरोपों को विशिष्ट रिकॉर्ड के आधार पर परखना होगा।

ECI से जुड़ा यह विवाद केवल दो चुनाव आयुक्तों के मतभेद का मामला नहीं है। इसके केंद्र में मतदाता सूची की विश्वसनीयता, नए मतदाताओं के पंजीकरण की प्रक्रिया, चुनावी डेटा की सुरक्षा और संवैधानिक संस्था के भीतर निर्णय लेने की पारदर्शिता जैसे महत्वपूर्ण प्रश्न हैं।

The Indian Express की रिपोर्ट ने आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों को सार्वजनिक चर्चा में लाया। चुनाव आयोग ने अपने फैसलों को सर्वसम्मत और वैधानिक बताया, जबकि BJP ने विपक्ष की आलोचना को राजनीतिक अभियान कहा। दूसरी ओर, विपक्ष ने स्वतंत्र जाँच और न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की।

अंततः यह तय करने के लिए कि कहाँ प्रशासनिक गलती हुई, कहाँ कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ और क्या किसी पात्र मतदाता के अधिकार प्रभावित हुए, संबंधित दस्तावेजों, मतदाता रिकॉर्ड और न्यायिक निष्कर्षों को देखना आवश्यक है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाता सूची की शुद्धता जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी है कि किसी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से न हटे और हर निर्णय पारदर्शी तथा कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप हो।

प्रमुख स्रोत

  1. The Indian Express — दो चुनाव आयुक्तों की 14 आपत्तियों पर खोजी रिपोर्ट: https://indianexpress.com/article/express-exclusive/election-commission-sir-14-objections-gyanesh-kumar-sukhbir-singh-sandhu-vivek-joshi-10889737/
  2. The Indian Express — चुनाव आयोग का जवाब: https://indianexpress.com/article/india/decisions-unanimous-election-commission-response-sir-vote-express-investigation-gyanesh-kumar-10890491/
  3. The Indian Express — BJP की प्रतिक्रिया: https://indianexpress.com/article/india/sir-row-sambit-patra-ec-deliberations-unanimity-bjp-10891175/
  4. Associated Press — 12 अक्टूबर के विरोध-प्रदर्शन की रिपोर्ट: https://apnews.com/article/4f8b0557165015b5de99abd55c2eaeaa
  5. आधिकारिक जानकारी — भारत निर्वाचन आयोग: https://www.eci.gov.in/