Jamia Student Union Election 20 साल से JMISU चुनाव बंद, AMU में 8 साल बाद मतदान

जामिया में 20 साल से छात्रसंघ चुनाव नहीं: आखिर छात्रों को अपना नेता चुनने का अधिकार कब मिलेगा?

नई दिल्ली | Hind Rashtra जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्रसंघ चुनाव का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। वर्ष 2006 के बाद से विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए हैं। चुनाव बहाल कराने की मांग को लेकर तीन छात्र अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे। सवाल सिर्फ चुनाव का नहीं, बल्कि छात्रों को अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार मिलने का भी है।

जामिया एक अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान है, जहां मुस्लिम छात्रों की बड़ी आबादी पढ़ती है। ऐसे में सवाल उठता है कि जिस संस्थान में शिक्षा और सामाजिक नेतृत्व की इतनी चर्चा होती है, वहां छात्र अपने प्रतिनिधि चुनने के लिए वर्षों से इंतजार क्यों कर रहे हैं?

क्या अपने ही लोग छात्रों को नेतृत्व करते नहीं देखना चाहते?

यह सवाल तीखा है, लेकिन इसका जवाब तथ्यों के आधार पर मिलना चाहिए। विश्वविद्यालय के प्रशासनिक पदों पर कौन बैठा है, यह अपनी जगह है; असली सवाल यह है कि छात्रसंघ चुनाव बहाल करने के लिए अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए?

किसी अधिकारी की धार्मिक पहचान के आधार पर यह मान लेना सही नहीं होगा कि वह छात्रों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के खिलाफ है। लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन से यह पूछना बिल्कुल जायज है कि चुनाव की प्रक्रिया आगे क्यों नहीं बढ़ी और छात्रों को स्पष्ट समय-सीमा कब दी जाएगी।

अगर चुनाव कराने में सुरक्षा, नियम या प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ी कोई बाधा है, तो उसे दूर करने की योजना सामने आनी चाहिए। केवल विभागीय प्रतिनिधियों की व्यवस्था का हवाला देना भी इस सवाल का पूरा जवाब नहीं है कि विश्वविद्यालय स्तर पर निर्वाचित छात्रसंघ क्यों नहीं है।

2006 के बाद से चुनाव क्यों नहीं हुए?

जामिया यूनिवर्सिटी में 2006 से छात्र संघ चुनाव नहीं, अपने प्रतिनिधि चुनने के अधिकार के लिए छात्रों का आंदोलन

जामिया में छात्रसंघ चुनाव लंबे समय से बंद हैं। चुनाव रोकने के पीछे अतीत में हिंसक घटनाओं और कैंपस में कानून-व्यवस्था से जुड़ी चिंताओं का उल्लेख किया गया था। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन समस्याओं का समाधान निकालकर चुनाव नहीं कराए जा सकते?

चुनाव के दौरान अनुशासन बनाए रखने के लिए नियम तय किए जा सकते हैं। निष्पक्ष मतदान, सुरक्षा और आचार संहिता की व्यवस्था की जा सकती है। ऐसे में छात्रों को यह जानने का अधिकार है कि चुनाव बहाल करने में मौजूदा बाधा आखिर क्या है।

प्रशासन चुनाव के खिलाफ नहीं, तो फिर देरी क्यों?

रिपोर्टों के अनुसार, जामिया प्रशासन ने चुनाव कराने का विरोध नहीं करने की बात कही है, जबकि औपचारिक अनुरोध और विभागीय प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों का भी उल्लेख किया गया है।

अगर प्रशासन वास्तव में चुनाव कराने के पक्ष में है, तो उसे छात्रों के साथ बातचीत कर प्रक्रिया और संभावित तारीखों पर स्पष्टता देनी चाहिए। वर्षों से लंबित मांग पर अब केवल आश्वासन के बजाय ठोस कदम दिखाई देने चाहिए।

AMU में भी आठ साल बाद हो रहे हैं छात्रसंघ चुनाव

यह सवाल सिर्फ जामिया तक सीमित नहीं है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) में भी छात्रसंघ चुनाव लंबे समय से नहीं हुए थे। इस बार करीब आठ साल के इंतजार के बाद चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ी है और मतदान के लिए 5 नवंबर 2026 की तारीख घोषित की गई है।

अब देखना यह होगा कि चुनाव की तारीख घोषित होने के बाद पूरी प्रक्रिया तय कार्यक्रम के अनुसार संपन्न होती है या नहीं। छात्रसंघ चुनाव की घोषणा अपने आप में अंतिम मंजिल नहीं है; असली कसौटी यह है कि मतदान, मतगणना और नतीजों तक पूरी प्रक्रिया समय पर और निष्पक्ष तरीके से पूरी हो।

अब जवाबदेही तय होनी चाहिए

जामिया और AMU दोनों के अनुभव एक अहम सवाल सामने रखते हैं: छात्रसंघ चुनाव आखिर इतने लंबे समय तक क्यों टलते रहते हैं? छात्रों को अपने प्रतिनिधि चुनने के लिए वर्षों इंतजार क्यों करना पड़ता है?

जामिया प्रशासन को चुनाव न होने के कारण स्पष्ट करने चाहिए और संभव हो तो चुनाव बहाल करने का समयबद्ध रोडमैप देना चाहिए। वहीं, AMU में घोषित कार्यक्रम का तय समय पर पूरा होना भी महत्वपूर्ण होगा।

छात्रों की मांग किसी एक समुदाय या संगठन का मुद्दा नहीं है। यह प्रतिनिधित्व, नेतृत्व और लोकतांत्रिक भागीदारी का सवाल है। विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों को यह जानने का हक है कि वे अपना प्रतिनिधि कब चुन सकेंगे—और प्रशासन को इसका स्पष्ट जवाब देना चाहिए।