छात्राओं के मताधिकार पर AMU का स्पष्टीकरण
अलीगढ, 3 नवंबर: अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी छात्रसंघ एवं यूनिवर्सिटी कोर्ट चुनाव के मुख्य निर्वाचन अधिकारी प्रोफेसर जावेद तालिब ने कहा है कि छात्राओं के मताधिकार के बारे में एक समाचार पत्र में छपी बात पूरी तरह भ्रामक है। हर पात्र छात्रा को मतदान का अधिकार है और किसी को भी इससे वंचित नहीं किया जा रहा है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि:
1. विमेंस कॉलेज का अपना अलग छात्रसंघ है, जिसे विमेंस कॉलेज छात्रसंघ (WCSU) कहा जाता है।
2. बीए, बीएससी और बीकॉम की छात्राओं का दाखिला विमेंस कॉलेज में होता है और वे WCSU के चुनाव में वोट देती हैं।
3. मुख्य परिसर के बाकी सभी विद्यार्थी, चाहे छात्र हों या छात्राएं, एएमयू छात्रसंघ (AMUSU) के चुनाव में वोट देते हैं।
4. सभी प्रोफेशनल पाठ्यक्रम और नॉन-प्रोफेशनल स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम सह-शिक्षा वाले हैं और मुख्य परिसर पर चलते हैं। इनके विद्यार्थी, चाहे छात्र हों या छात्राएं, AMUSU के लिए वोट देते हैं।
प्रोफेसर तालिब ने बताया कि नई शिक्षा नीति लागू होने के बाद स्नातक के चौथे वर्ष की छात्राएं अब अपने-अपने संकायों और विभागों में कक्षाएं करती हैं। इसका कारण यह है कि उस स्तर पर हर विषय पढ़ाने के लिए विमेंस कॉलेज के पास आवश्यक बुनियादी ढांचा और शिक्षक नहीं हैं जबकि विभागों में विषय विशेषज्ञ शिक्षक और आवश्यक शैक्षणिक सुविधाएं उपलब्ध हैं। इन छात्राओं का दाखिला अब भी विमेंस कॉलेज में ही है, इसलिए वे WCSU और एएमयू कोर्ट दोनों के चुनाव में विमेंस कॉलेज से ही मतदान करेंगी। विश्वविद्यालय प्रशासन दोनों चुनावों में उन्हें पूरा सहयोग और सुविधा प्रदान करेगा।
उन्होंने कहा, “जहां तक एएमयू कोर्ट के चुनाव का सवाल है, लगभग 4,080 छात्राएं अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगी। किसी भी छात्रा को उसके वोट के अधिकार से वंचित नहीं किया जा रहा है। विमेंस कॉलेज की निर्वाचन अधिकारी और मैंने मिलकर यह सुनिश्चित किया है कि हर पात्र छात्रा को वोट देने का पूरा अवसर मिले।”
मीडिया की भूमिका और AMU की दो छात्रसंघ व्यवस्थाओं पर सवाल
AMU की एक खास व्यवस्था यह भी है कि यहां मुख्य छात्रसंघ (AMUSU) के साथ छात्राओं के लिए अलग विमेंस कॉलेज छात्रसंघ (WCSU) भी है। ऐसे में छात्राओं की भागीदारी और प्रतिनिधित्व को लेकर विश्वविद्यालय की इस व्यवस्था को सकारात्मक पहल के रूप में भी देखा जाना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि जब विश्वविद्यालय प्रशासन मीडिया को आमंत्रित करने के लिए ‘मेनस्ट्रीम मीडिया’ का पैमाना तय करता है, तो आखिर इस पैमाने का आधार क्या है? क्या विश्वविद्यालय से जुड़े मुद्दों को उठाने वाले सभी मीडिया संस्थानों को समान अवसर नहीं मिलना चाहिए? फाइनल स्पीच जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में कुछ चुनिंदा मीडिया संस्थानों को आमंत्रित किए जाने की चर्चा के बीच यह सवाल भी जरूरी है कि मीडिया के बीच दूरी बनाने की आवश्यकता क्यों महसूस होती है? एक और बात विचारणीय है कि जहां विश्वविद्यालय की सकारात्मक उपलब्धियों को प्रमुखता देने में कुछ मीडिया संस्थान पीछे नजर आते हैं, वहीं नकारात्मक पहलुओं को तलाशकर प्रमुखता से दिखाया जाता है। ऐसे में AMU से जुड़े लोगों और विश्वविद्यालय प्रशासन से एक सहज सवाल है—वे मीडिया की कैसी भूमिका देखना चाहते हैं? क्या ऐसा मीडिया जो केवल सकारात्मक खबरें दिखाए, या ऐसा जो केवल नकारात्मक पहलुओं को तलाशे? या फिर ऐसा जिम्मेदार मीडिया जो विश्वविद्यालय की उपलब्धियों को भी सामने लाए और कमियों पर भी तथ्यात्मक सवाल उठाए? आखिर स्वस्थ संवाद और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए सभी पक्षों को समान अवसर मिलना जरूरी नहीं है?
मीडिया की अनधिकृत एंट्री रोकने के लिए PR Office से पास जारी करने की पारदर्शी व्यवस्था बनाई जा सकती थी, ताकि हर पत्रकार नियमपूर्वक कार्यक्रम में शामिल हो। लेकिन कुछ चुनिंदा मीडिया संस्थानों और पत्रकारों को ही बुलाना Selective Media और Selective Press की संस्कृति को बढ़ावा देता है। सवाल व्यवस्था का नहीं, सबको समान अवसर देने की मंशा का है।

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“खींचो न कमानों को, न तलवार निकालो,
जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो।”
Mudassir
News Editor
hindrashtra.com
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