सर सैयद अहमद ख़ाँ की शैक्षिक विरासत से सुप्रीम कोर्ट तक: AMU के पूर्व छात्र जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की कहानी
AMU Sir Syed Day 2026: अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में सर सैयद अहमद ख़ाँ की 209वीं जयंती पर मुख्य अतिथि बने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह का विश्वविद्यालय से खास रिश्ता है। यहीं से उन्होंने स्कूली शिक्षा के बाद उच्च शिक्षा हासिल की। समारोह में उन्होंने विद्यार्थियों को असफलताओं से सीखने, किताबें पढ़ने, वैज्ञानिक सोच अपनाने और समाज की बेहतरी के लिए काम करने का संदेश दिया।
अलीगढ़। सर सैयद अहमद ख़ाँ ने शिक्षा को सामाजिक बदलाव और प्रगति का माध्यम बनाने के लिए जिस आंदोलन की शुरुआत की थी, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) आज भी उसी विरासत को आगे बढ़ा रहा है। 17 अक्टूबर 2026 को विश्वविद्यालय में आयोजित सर सैयद डे समारोह में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। उनकी उपस्थिति इसलिए भी खास रही, क्योंकि वह स्वयं AMU के पूर्व छात्र हैं। उनकी शैक्षिक यात्रा और विद्यार्थियों के नाम उनका संदेश सर सैयद के शिक्षा संबंधी विचारों से जुड़ता है।
AMU से क्या है जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह का रिश्ता?
जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह का जन्म 12 मार्च 1963 को पंजाब के रोपड़ में हुआ था। शुरुआती पढ़ाई हिमाचल प्रदेश के कसौली स्थित सेंट मैरी कॉन्वेंट स्कूल में करने के बाद उन्होंने अलीगढ़ के सैफुद्दीन ताहिर हाई स्कूल से स्कूली शिक्षा पूरी की। इसके बाद उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से विज्ञान में ऑनर्स और फिर एलएलबी (ऑनर्स) की डिग्री हासिल की।
AMU से शिक्षा हासिल करने के बाद उन्होंने कानून के क्षेत्र में अपना करियर बनाया। 6 जून 1987 को पंजाब एवं हरियाणा बार काउंसिल में अधिवक्ता के रूप में नामांकन कराने के बाद उन्होंने संवैधानिक कानून, सेवा कानून, श्रम कानून और दीवानी मामलों में वकालत की। उन्होंने पंजाब के महाधिवक्ता कार्यालय में सहायक, उप और अतिरिक्त महाधिवक्ता के रूप में भी काम किया।
10 जुलाई 2008 को वह पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के अतिरिक्त न्यायाधीश बने और 14 जनवरी 2011 को स्थायी न्यायाधीश नियुक्त हुए। 30 मई 2023 को उन्हें राजस्थान हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया। इसके बाद 9 नवंबर 2023 को उन्होंने भारत के सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में कार्यभार संभाला।
सुप्रीम कोर्ट में कितने न्यायाधीश हैं और जस्टिस मसीह की क्या भूमिका है?
भारत का सुप्रीम कोर्ट देश की न्यायपालिका का सर्वोच्च न्यायालय है। अगस्त 2026 में लागू हुए संशोधन के बाद इसकी स्वीकृत न्यायाधीश संख्या बढ़ाकर 38 कर दी गई है, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और 37 अन्य न्यायाधीश शामिल हैं। और न्यायाधीशों की संख्या से संबंधित संशोधन अधिनियम इस व्यवस्था का कानूनी आधार हैं।
जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों में से एक हैं। वह भारत के मुख्य न्यायाधीश नहीं हैं, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में संवैधानिक और अन्य महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई करने वाली न्यायिक व्यवस्था का हिस्सा हैं। किसी न्यायाधीश का काम कानून और संविधान के अनुसार मामलों पर विचार करना तथा न्यायिक निर्णयों में योगदान देना है।
उनकी नियुक्ति 9 नवंबर 2023 को हुई थी। सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक प्रोफाइल के अनुसार, उनकी सेवानिवृत्ति की निर्धारित तारीख 11 मार्च 2028 है। न्यायाधीशों की संख्या उनकी वरिष्ठता या किसी निश्चित क्रम की रैंकिंग नहीं बताती।

सर सैयद के संघर्ष से आज के युवाओं के लिए क्या सीख है?
सर सैयद डे समारोह को संबोधित करते हुए जस्टिस मसीह ने सर सैयद अहमद ख़ाँ के संघर्ष और दृढ़ संकल्प को आज के युवाओं के सामने आने वाली चुनौतियों से जोड़ा। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि जीवन में केवल सफलता हासिल करना ही नहीं, बल्कि असफलताओं का सामना करना और उनसे सीखना भी जरूरी है।
उन्होंने सर सैयद के शैक्षिक आंदोलन का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने विरोध को अवसर में बदलने का प्रयास किया। साहस, धैर्य और दृढ़ संकल्प के साथ चुनौतियों का सामना करने पर असफलताएं भी उपलब्धि की सीढ़ियां बन सकती हैं।
यह संदेश सर सैयद के जीवन से जुड़ता है। उन्होंने शिक्षा के माध्यम से समाज को नई दिशा देने का प्रयास किया और आधुनिक ज्ञान, वैज्ञानिक सोच तथा तर्कशीलता को आगे बढ़ाने पर जोर दिया। जस्टिस मसीह ने भी विद्यार्थियों को कठिन परिस्थितियों में हिम्मत बनाए रखने और अपने लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्ध रहने के लिए प्रेरित किया।
मोबाइल और डिजिटल सामग्री के दौर में किताबें पढ़ने की जरूरत
अपने संबोधन में जस्टिस मसीह ने पढ़ने, वैज्ञानिक खोज, तर्कशीलता और खुले विचारों के प्रति सर सैयद की प्रतिबद्धता को रेखांकित किया। उन्होंने विद्यार्थियों को डिजिटल सामग्री पर सतही निर्भरता के बजाय गंभीरता से पढ़ने की आदत विकसित करने के लिए प्रेरित किया।
उन्होंने कहा कि किताबें ज्ञान बढ़ाने के साथ अभिव्यक्ति को बेहतर बनाती हैं और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता विकसित करती हैं। उनका संदेश था कि शिक्षा केवल परीक्षा पास करने या डिग्री हासिल करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि विद्यार्थियों में स्वतंत्र रूप से सोचने, सवाल पूछने और समाज को समझने की क्षमता भी विकसित करनी चाहिए।
सर सैयद के शैक्षिक विचारों में भी ज्ञान, तर्क और आधुनिक शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका थी। ऐसे में विद्यार्थियों को पढ़ने और विचार करने के लिए प्रेरित करना उनकी विरासत को आगे बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
सर सैयद का हिंदू-मुस्लिम सद्भाव का विचार और AMU की पहचान
जस्टिस मसीह ने सर सैयद अहमद ख़ाँ की सांप्रदायिक सद्भाव की सोच का उल्लेख करते हुए कहा कि उनका विश्वास था कि हिंदू और मुसलमानों का भविष्य एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। उन्होंने AMU के विविधतापूर्ण परिसर को इस विचार का जीवंत उदाहरण बताया, जहां अलग-अलग क्षेत्रों और पृष्ठभूमियों से आने वाले विद्यार्थी साथ पढ़ते, सीखते और आगे बढ़ते हैं।
सर सैयद की विरासत का एक महत्वपूर्ण पक्ष शिक्षा के साथ सामाजिक संवाद और सहयोग को बढ़ावा देना भी है। विश्वविद्यालय का विविध शैक्षिक वातावरण विद्यार्थियों को अलग-अलग विचारों को समझने, एक-दूसरे का सम्मान करने और साझा समाज के लिए जिम्मेदारी निभाने का अवसर देता है।
AMU ने कक्षा से बाहर भी सिखाए जीवन के सबक
विश्वविद्यालय से अपने जुड़ाव को याद करते हुए जस्टिस मसीह ने कहा कि AMU ने उन्हें कक्षा से बाहर भी सम्मान, संवाद, मित्रता और जिम्मेदारी के महत्वपूर्ण सबक सिखाए। उन्होंने विश्वविद्यालय की पहली महिला कुलपति प्रो. नइमा खातून की सर सैयद की सोच को उद्देश्य और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ाने के लिए सराहना की।
उन्होंने विद्यार्थियों से व्यक्तिगत उपलब्धियों से आगे सोचने और आने वाली पीढ़ियों के लिए अवसरों का निर्माण करने का आह्वान किया। उनके अनुसार, शिक्षा का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित नहीं रहना चाहिए; इसका लाभ समाज और भविष्य की पीढ़ियों तक पहुंचना भी जरूरी है।
सर सैयद को सच्ची श्रद्धांजलि क्या होगी?
सर सैयद अहमद ख़ाँ की 209वीं जयंती पर जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह का संबोधन उनकी शैक्षिक विरासत को वर्तमान समय से जोड़ने वाला संदेश रहा। AMU से शिक्षा हासिल कर देश के सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचे जस्टिस मसीह की यात्रा भी शिक्षा के महत्व को रेखांकित करती है।
उनके संबोधन का सार यही रहा कि विद्यार्थियों को पढ़ने की आदत विकसित करनी चाहिए, वैज्ञानिक और तर्कशील दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, असफलताओं से सीखना चाहिए और सामाजिक सद्भाव को मजबूत करना चाहिए। सर सैयद अहमद ख़ाँ के विचारों को आगे बढ़ाने का अर्थ भी यही है कि शिक्षा को व्यक्तिगत उपलब्धि के साथ-साथ सामाजिक प्रगति का माध्यम बनाया जाए।
आने वाली पीढ़ियों के लिए अवसर पैदा करना, ज्ञान को महत्व देना और समाज की बेहतरी के लिए काम करना ही सर सैयद के शैक्षिक मिशन को आगे बढ़ाने की दिशा में सार्थक कदम हो सकता है।