नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव अपनी चुनावी रणनीति में बड़े बदलाव की ओर बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। सपा के मौजूदा सामाजिक समीकरण का विस्तार करने के प्रयासों के बीच अखिलेश यादव ने जनसुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर से संपर्क कर उत्तर प्रदेश में संभावित सहयोग को लेकर बातचीत की है।
राजनीतिक हलकों में इस बातचीत को केवल चुनावी सलाह लेने की कोशिश के तौर पर नहीं, बल्कि सपा के लिए नया राजनीतिक और सामाजिक नैरेटिव तैयार करने की कवायद के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी की कोशिश अपने पारंपरिक वोट बैंक के साथ नए मतदाता वर्गों तक पहुंच बनाने की है।
प्रशांत किशोर से फोन पर बातचीत
सूत्रों के मुताबिक अखिलेश यादव ने प्रशांत किशोर से फोन पर बात की और उत्तर प्रदेश में साथ काम करने की संभावनाओं पर चर्चा की। शुरुआती बातचीत को सकारात्मक बताया जा रहा है। हालांकि दोनों पक्षों के बीच किसी औपचारिक समझौते की जानकारी सामने नहीं आई है।
यदि बातचीत आगे बढ़ती है तो इसे समाजवादी पार्टी की चुनावी रणनीति में महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा सकता है। सपा अब जातीय और पारंपरिक वोट बैंक के साथ मुद्दों पर आधारित व्यापक चुनावी रणनीति तैयार करने की कोशिश कर सकती है।
PDA के जरिए सामाजिक आधार बढ़ाने की कोशिश
अखिलेश यादव पिछले कुछ समय से PDA के राजनीतिक फॉर्मूले पर जोर देते रहे हैं। अब इसकी परिभाषा और सामाजिक दायरे को विस्तार देने की कोशिश दिखाई दे रही है। पंडित समुदाय को भी इस राजनीतिक समीकरण से जोड़ने की कवायद को सवर्ण मतदाताओं तक पहुंच बनाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
जनेश्वर मिश्र की जयंती को बड़े स्तर पर मनाने जैसे कार्यक्रमों को भी समाजवादी पार्टी के सामाजिक आधार को व्यापक बनाने की कोशिश से जोड़कर देखा जा रहा है।
पारंपरिक वोट बैंक से आगे जाने की चुनौती
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का मजबूत आधार पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों के एक हिस्से में माना जाता है। हालांकि पार्टी के सामने चुनौती इस आधार से आगे बढ़कर युवाओं, शहरी मध्यवर्ग, पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं और सवर्ण समाज के एक हिस्से तक पहुंच बनाने की है।
हाल के चुनावों से विपक्षी दलों के सामने यह सवाल भी खड़ा हुआ है कि क्या केवल परंपरागत सामाजिक समीकरण के सहारे सत्ता तक पहुंचना संभव है। यही वजह है कि सपा अपनी रणनीति में नए मतदाता समूहों को जोड़ने की संभावनाएं तलाश रही है।
प्रशांत किशोर का मॉडल क्यों महत्वपूर्ण?
प्रशांत किशोर लंबे समय से चुनावी रणनीति और राजनीतिक अभियानों से जुड़े रहे हैं। बिहार में जनसुराज के जरिए उन्होंने संगठन निर्माण, पदयात्रा और प्रत्यक्ष राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभाई है।
रोजगार, शिक्षा, स्थानीय विकास, भ्रष्टाचार और बेहतर जनप्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों को चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाने की उनकी रणनीति विपक्षी दलों का ध्यान खींचती रही है। अखिलेश यादव के लिए भी ऐसा मॉडल उत्तर प्रदेश में जातीय समीकरण के साथ मुद्दा आधारित राजनीति को मजबूत करने में उपयोगी माना जा सकता है।
युवाओं और शहरी वोटरों पर सपा की नजर
2024 के लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में बने नए समीकरणों के बीच सपा अब विधानसभा चुनाव के लिए अपनी रणनीति को और व्यापक बनाने की कोशिश में है। पार्टी की नजर खास तौर पर युवाओं, शहरी मतदाताओं और पहली बार वोट डालने वाले लोगों पर है।
रोजगार, शिक्षा, महंगाई, स्थानीय विकास और शासन से जुड़े मुद्दों के जरिए इन मतदाताओं तक पहुंच बनाने की रणनीति सपा के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।
पहले रणनीतिकारों को लेकर अलग थी अखिलेश की राय
अखिलेश यादव इससे पहले बाहरी चुनावी रणनीतिकारों की भूमिका को लेकर अलग रुख रखते दिखाई दिए थे। पार्टी अपने संगठन और कार्यकर्ताओं के दम पर चुनाव लड़ने को प्राथमिकता देती रही है।
अब प्रशांत किशोर से बातचीत की खबरों ने संकेत दिया है कि आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए सपा नए विकल्पों पर भी विचार कर रही है। हालांकि यह साफ होना अभी बाकी है कि संभावित सहयोग केवल रणनीतिक सलाह तक सीमित रहेगा या दोनों पक्ष किसी बड़े राजनीतिक अभियान पर साथ काम करेंगे।
संगठन निर्माण का अनुभव भी अहम
प्रशांत किशोर ने विभिन्न राजनीतिक दलों के लिए चुनावी रणनीति तैयार करने के बाद बिहार में जनसुराज अभियान के जरिए जमीनी राजनीति में कदम रखा। लंबी पदयात्राओं और संगठन निर्माण के जरिए उन्होंने सीधे मतदाताओं तक पहुंच बनाने का प्रयास किया।
इसी अनुभव को देखते हुए उनकी संभावित भूमिका को केवल चुनावी मैनेजमेंट तक सीमित करके नहीं देखा जा रहा है। सपा के लिए उनका अनुभव संगठन, मुद्दों के चयन, मतदाताओं तक पहुंच और चुनावी नैरेटिव तैयार करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
फिलहाल अखिलेश यादव और प्रशांत किशोर के बीच संभावित सहयोग को लेकर कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है। ऐसे में आगे की बातचीत और दोनों पक्षों की आधिकारिक प्रतिक्रिया के बाद ही यह साफ होगा कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर की भूमिका क्या होगी।