सदन में दिए गए वक्त पर अपनी बात रख रहे अलीगढ़ सांसद सतीश गौतम ने कहा जवाहरलाल मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में मुस्लिम डॉक्टर का प्रभाव ज्यादा है इस वजह से अन्य वर्ग के लोग वहां पर अपना इलाज कराने नहीं आते हैं लगाए गए इस आरोप पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की तरफ से इस झूठे आरोपों का खंडन किया गया है.
यह बात तब हुई जब अलीगढ़ सांसद जिला अस्पताल के एक अस्पताल को एम्स के तर्ज पर बनाने की बात कर रहे थे लेकिन इसमें एक बड़ा सवाल यह है चुनाव से लेकर और विकास की मांगों तक क्या भारत के मुस्लिम समाज को निशाना बनाकर ही चुनाव जीतने और विकास का काम कर सकते हैं। और क्या यही है सबका साथ सबका विकास और सब का विश्वास का नारा क्या इस तरह से भारत को मजबूत करेंगे अलीगढ़ के सांसद।
वहीं पूर्व जवाहरलाल मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल एवं पूर्व कुलपति एवं भाजपा नेता राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तारीक मंसूर का इस मामले पर अभी तक कोई जवाब नहीं आया है । उनके पार्टी संसद द्वारा आरोप लगाए गए पर उनकी खामोशी क्या बयां करती है?
हालांकि 2024 लोकसभा चुनाव में अलीगढ़ क्षेत्र से मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुछ प्रोफेसर्स ने अपने एथिक्स के खिलाफ जाकर राजनीतिक पार्टी की सभा में शिरकत की और भाजपा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के कहने पर समर्थन किया क्या वह इसी दिन के लिए समर्थन कर रहे थे कि क्षेत्रीय सांसद पश्चिमांचल के सबसे बड़े मेडिकल कॉलेज अस्पताल पर सिर्फ इसलिए आरोप लगाए कि वहां पर मुसलमान डॉक्टर की तादाद ज्यादा है!
हालांकि हकीकत क्या है अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के जवाहरलाल मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल का जवाब आ गया है।
AMU द्वारा जेएन मेडिकल कॉलेज JNMC के खिलाफ झूठे आरोपों का खंडन।
अलीगढ़, 4 अगस्तः हाल ही में अलीगढ़ के सांसद श्री सतीश गौतम द्वारा अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय के जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज (जेएनएमसी) के विरुद्ध सांप्रदायिक पूर्वाग्रह से ग्रस्त गलत और भ्रामक आरोप लगाया गया है। उनकी राय माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को मिनी इंडिया करा देने के दृष्टिकोण के विपरीत है।
जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज की प्रिंसिपल और मुख्य चिकित्सा अधीक्षक प्रो. वीणा महेश्वरी ने अस्पताल में कथित धर्म जाति-आधारित भेदभाव के बारे में चिंताओं को संबोधित करते हुए ऐसे दावों का जोरदार ढंग से खंडन किया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि कॉलेज जाति, पंथ, धर्म या लिंग की परवाह किए बिना सभी रोगियों के साथ एक समान व्यवहार करता है।
उन्होंने कहा कि जेएनएमसी में दीन दयाल अस्पताल अलीगढ़ से रेफर किए गए मरीजों का इलाज किया जाता रहा है और उस अस्पताल का दर्जा बढ़ाने के लिए जेएन मेडिकल कॉलेज के खिलाफ निराधार आरोप लगाना अनुचित और अनावश्यक है।
प्रो. महेश्वरी ने कहा कि जेएनएमसी बदायूं, मुरादाबाद, बुलंदशहर, एटा और कासगंज सहित विभिन्न जिलों से प्रतिदिन लगभग 4,000 से 4,500 रोगियों को स्वास्थ्य सेवा और देखभाल प्रदान करता है। इस के अतिरिक्त जेएनएमसी जननी सुरक्षा योजना (जेएसवाई), आयुष्मान भारत स्वास्थ्य खाता (एबीएचए) योजना, आयुष्मान भारत और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) जैसी सरकारी योजनाओं के तहत काम करता है, जो यह सुनिश्चित करता है कि समाज के सभी वर्गों के रोगियों को बिना किसी पूर्वाग्रह के देखभाल मिले।
निष्पक्ष स्वास्थ्य सेवा के लिए कॉलेज की प्रतिबद्धता इसके स्टाफ की नियुक्तियों में भी परिलक्षित होती है, जो सरकारी प्रक्रियाओं के माध्यम से की जाती हैं, जो समाज के एक विस्तृत स्पेक्ट्रम का प्रतिनिधित्व करती हैं।
उन्होंने कहा कि मैं पिछले 40 वर्षों से इस संस्था से जुडी हूं और मैंने यहाँ कभी कोई भेदभाव नहीं देखा है। कोविड-19 महामारी के दौरान, जेएनएमसी ने भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) द्वारा चयनित कोवैक्सिन परीक्षणों के केंद्रों में से एक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जेएनएमसी वैक्सीन परीक्षण के लिए 1,000 स्वयंसेवकों को नामांकित करने वाला पहला कॉलेज था, जो एक मील का पत्थर है जिसे प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने भी स्वीकार किया।
महामारी के दौरान यहाँ के डॉक्टरों और कर्मचारियों के प्रयास, जहाँ कई लोगों ने अपनी जान जोखिम में डाल दी और उनमें से 20 से अधिक की इस दौरान मृत्यु हो गई, सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति कॉलेज के समर्पण और राष्ट्र की सेवा के प्रति इसकी अटूट प्रतिबद्धता को उजागर करता है।
प्रो महेश्वरी ने कहा कि 2003 में घोषित प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना (पीएमएसएसवाई) के तहत स्थापित जेएनएमसी का ट्रॉमा सेंटर निहायत किफायती दर पर उच्च स्तर कि स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान कर रहा है, और यह सुनिश्चित करता है कि स्वास्थ्य सेवा बिना किसी भेदभाव के सभी के लिए सुलभ हो।
उन्होंने कहा कि यह कॉलेज अलीगढ़ परिक्षेत्र में, विशेष रूप से कोविड-19 महामारी जैसे संकट के दौरान, एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य सेवा प्रदाता के रूप में भी मौजूद है जब इसने लेवल-2 समर्पित कोविड अस्पताल के रूप में काम किया जिसका आम जान मानस द्वारा सराहा गया।
आपको बता दे भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रोफेसर तारिक मंसूर एवं पूर्व कुलपति एवं पूर्व में रहे मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल भी अपने पार्टी सांसद को बता सकते हैं क्या अलीगढ़ मुस्लिम विश्वाविद्यालय के मेडिकल कॉलेज में उपचार कैसे होते हैं और वाहा के जो मुस्लिम डॉक्टर्स हैं क्या काबिल नहीं है। अगर पार्टी संसद की बातों में दम है तो फिर वहां के लोगों को अपने पार्टी में जगह देने का क्या मतलब?
राजनीतिक कार्यक्रम हो या देश का लोकतंत्र का मंदिर कहे जाने वाला सदन जहां भी मुसलमान थोड़ा बहुत डोमिनेंट करेगा उसको निशाना बना लिया जाता है हालांकि इस केस में केंद्रीय शासित विश्वविद्यालय और उसका मेडिकल कॉलेज में भले मुसलमान का ज्यादा प्रभाव हो पर उसे व्यवस्था से अगर गरीब और दूर दराज इलाके से आए लोगों का इलाज अपने सही समय पर और सही तरीके से मिल रहा हो फिर किसी के आरोप लगाने से व्यवस्था पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
और अलीगढ़ में एम्स जैसे मेडिकल हॉस्पिटल अगर और चाहिए तो अलीगढ़ के लिए अच्छी बात है पर मुसलमान को निशाना बनाकर भेदभाव कर कर नफरत के बुनियाद पर रखी गई हॉस्पिटल मैं कल को नफरत के शिकार हुए लोगों की तादाद मरीज की शक्ल में ज्यादा दिखाई देगी बेहतर है बड़ा काम नियत साफ करके इसकी बुनियाद रखी जाए।
टीवी चेस्ट स्पेशलिस्ट प्रोफेसर शमीम खुद कोविद-19 महामारी के दौरान इलाज करते हुए इस भयानक बीमारी के चपेट में आ गए और उसके बावजूद अपनी सर्विस अपने घर से जारी रखा जब तक वह सही नहीं हो गए और फिर मरीज के बीच में दिखाई देने लगे और केंद्र शासित भाजपा सरकार के मंत्रियों ने इस बात की सराहना भी की थी पर दिल्ली में बैठे लोगों को सब कुछ दिखाई दे रहा है पर क्षेत्रीय सांसद आंख मूंद कर सदन में अपनी बात रखते हुए नजर आए।
जहां एक तरफ अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को भारत के प्रधानमंत्री भाजपा सरकार के वरिष्ठ नेता नरेंद्र मोदी जी ने मिनी इंडिया का खिताब दिया।
और कोविद-19 महामारी के दौरान जिस तरीके से अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के डॉक्टर ने अपनी जान की बाजी लगा दी कई शहीद हो गए और यही वजह रही यूपी सरकार शासित भाजपा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को आकर यूनिवर्सिटी के डॉक्टरों का अभिवादन करना पड़ा।
मौजूदा भाजपा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और एक वक्त में रहे मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल और पूर्व कुलपति मोहम्मद तारिक मंसूर उस वक्त के गवाह है किस तरह से उनके डॉक्टर ने जब-जब मौका मिला अपनी जान की परवाह किए बगैर लोगों के इलाज के लिए मौके पर मौजूद रहे।