असद, अतीक, अशरफ की हत्या, योगी सरकार की ‘मिट्टी में मिला देने’ वाली मुहिम हुई कामयाब!
यह असद, अतीक अहमद और अशरफ की हत्या नहीं बल्कि लोकतंत्र और कानून की हत्या है।
सरकारें और पुलिस अगर खुद ही ठोक दो की पॉलिसी पर काम करेगी तो फिर अदालत में ताला लगा देना बेहतर है…!
चश्मदीद के मुताबिक चारों लड़के को जिसे पुलिस ने अपनी गाड़ी में लाया मिडिया वाला बनाकर और उसी से अतीक और अशरफ की हत्या करवाया, वो आखिर किसका आदमी है?
ऑल इंडिया इत्तेहादुल मुस्लिमीन बिहार के नेता बेदारी कारवां अध्यक्ष नजरे आलम ने सवाल करते हुए कहा पुलिस की सुरक्षा के घेरे में कोई मंत्री या नेता नहीं मारा जाता है लेकिन पुलिस की सुरक्षा के घेरे में एक अल्पसंख्यक नेता को उस वक्त तक गोलियों से भूना जाता है जबतक पूरी गोलियां खत्म नहीं हो जाती है।
नजरे आलम ने hindrashtra.com को बताया हद तो ये है कि पुलिस ने रोकने की कोशिश तक नहीं की और नहीं किसी अपराधी पर पलटवार किया।
हत्यारे ठोकने के बाद खुद ही पुलिस के सामने सरेंडर कर देता है। जो भारत के तथाकथित प्रजातंत्र, तथाकथित संविधान, तथाकथित न्यायालय और शासन प्रशासन पर प्रश्न लगाने के लिए काफी है।
बेदारी कारवां अध्यक्ष एवं एम आई एम नेता नजरे आलम ने कहा अगर कोई अपराध करता है तो उसके लिए हमारे देश का कानून, न्यायिक व्यवस्था है लेकिन पिछले कुछ वर्षों में हमारे देश की तथाकथित प्रजातंत्र है जहां अपराध करने वाले को सजा की जगह सम्मानित किया जाता है, रेपिस्टों को माला और मिठाई खिलाई जाती है और गुंडों को सरकार की ओर से बड़ा बड़ा पद देकर सम्मानित किया जाता है।

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