JMI में ईरान युद्ध पर विशेष व्याख्यान, West Asia और Global Politics पर चर्चा

JMI के सेंटर फॉर वेस्ट एशियन स्टडीज़ ने ‘ईरान युद्ध और पश्चिम एशिया तथा विश्व राजनीति पर इसके असर’ विषय पर एक लेक्चर आयोजित किया।

21 सितंबर, 2026, नई दिल्ली।

सेंटर फॉर वेस्ट एशियन स्टडीज़ (CWAS), जामिया मिलिया इस्लामिया (JMI), नई दिल्ली ने 18 सितंबर, 2026 को JMI के इंडिया अरब कल्चरल सेंटर के कॉन्फ्रेंस हॉल में “ईरान युद्ध और पश्चिम एशिया तथा विश्व राजनीति पर इसके असर” विषय पर एक विशेष लेक्चर आयोजित किया। साउथ एशियन यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली के फैकल्टी ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ में एसोसिएट प्रोफेसर और एसोसिएट डीन डॉ. धनंजय त्रिपाठी वक्ता थे, और सत्र की अध्यक्षता प्रो. H.A. नाज़मी (निदेशक, CWAS) ने की, जबकि CWAS के सेमिनार संयोजक प्रो. अनीसुर रहमान ने इसका संचालन किया।

JMI के CWAS के निदेशक प्रो. H.A. नाज़मी ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए JMI के वाइस चांसलर प्रो. मज़हर आसिफ और रजिस्ट्रार प्रो. मो. महताब आलम रिज़वी का धन्यवाद किया। उन्होंने ऐसे कार्यक्रमों के आयोजन के लिए उनके प्रोत्साहन की सराहना की, जो कैंपस में रिसर्च का माहौल बनाते हैं और एकेडमिक गतिविधियों को बढ़ावा देते हैं। अपने स्वागत भाषण में, उन्होंने इस अहम विषय पर विशेष लेक्चर देने के लिए सेंटर का निमंत्रण स्वीकार करने पर वक्ता का भी धन्यवाद किया। प्रो. अनीसुर रहमान ने मेहमान और लेक्चर के विषय का परिचय दिया, जिसमें ईरान-अमेरिका युद्ध और विशेष रूप से पश्चिम एशिया तथा आम तौर पर दुनिया पर इसके असर पर प्रकाश डाला गया।

डॉ. धनंजय त्रिपाठी ने अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच हालिया संघर्ष का विश्लेषण करते हुए कहा कि चर्चा केवल संघर्ष के सैन्य पहलू से आगे बढ़कर उन रणनीतिक, आर्थिक, वैचारिक और भावनात्मक पहलुओं की पड़ताल करती है जिन्होंने इसकी दिशा और नतीजों को आकार दिया। वक्ता ने इस युद्ध को गलत आकलन (miscalculation) के एक केस स्टडी के तौर पर पेश किया, जिसने पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय संबंध सिद्धांत की सीमाओं को उजागर किया और वैश्विक शक्ति के बदलते पैटर्न को दिखाया। उन्होंने बताया कि इस संघर्ष को मध्य पूर्व में मुख्य सुरक्षा प्रदाता के तौर पर अमेरिका की लंबे समय से बनी छवि के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा गया। डॉ. त्रिपाठी ने आगे इस बात पर ज़ोर दिया कि यह संघर्ष सरकारी पक्षों (state actors) द्वारा रणनीतिक गलत आकलन के व्यापक पैटर्न का हिस्सा है, जहाँ इरादे के मुताबिक नतीजे असल नतीजों से बिल्कुल अलग होते हैं; यह खास तौर पर राजनीतिक समस्याओं के सैन्य समाधान पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा करने के खिलाफ एक चेतावनी है। सवाल-जवाब के सेशन में हिस्सा लेने वालों ने इस बात पर बहस की कि क्या इस टकराव के नतीजे अमेरिका के लिए सचमुच एक रणनीतिक हार थे। इस बहस में कई बातों पर गौर किया गया: बताए गए मकसद और असल नतीजों के बीच का अंतर, इलाके में चीन की बढ़ती भूमिका, ईरान की अर्थव्यवस्था का टिके रहना, और ईरान-अमेरिका-इजराइल टकराव के बीच भारत का नपा-तुला रुख (जो अलग-अलग गुटों के बीच अपने ऊर्जा, रणनीतिक और कूटनीतिक हितों में संतुलन बनाने की नई दिल्ली की बड़ी रणनीति को दिखाता है)।

सेंटर की ओर से प्रो. सेबेस्टियन एन. ने औपचारिक रूप से धन्यवाद प्रस्ताव पेश किया। उन्होंने सेशन के वक्ता का आभार जताया और लेक्चर को सफलतापूर्वक आयोजित करने के लिए डायरेक्टर प्रो. एच. ए. नाज़मी और कन्वीनर प्रो. अनीसुर रहमान को बधाई दी। साथ ही, उन्होंने इस खास मौके पर मौजूद रहने के लिए दर्शकों—जिनमें अलग-अलग सेंटरों और विभागों के फैकल्टी सदस्य, रिसर्च स्कॉलर और छात्र शामिल थे—