अलीगढ़, 20 दिसंबरः अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ एडवांस्ड स्टडी, इतिहास विभाग ने ‘इंडो-फारसी हिस्टोरियोग्राफी’ पर एक सप्ताह तक चलने वाली कार्यशाला का आयोजन किया, जिसमें विशेषज्ञों ने ग्यारह अलग-अलग सत्रों में 25 व्याख्यान दिए और इतिहास लेखन में मध्यकालीन भारत का फारसी स्रोतों पर चर्चा की।
प्रो. गुलफिंशान खान (अध्यक्ष और समन्वयक, उन्नत अध्ययन केंद्र, इतिहास विभाग) ने कहा भारत के फारसी ऐतिहासिक ग्रंथ भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे समृद्ध विद्वानों की परंपराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने कहा कि शोध छात्रों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे खुद को मूल और भारत-फारसी इतिहास-लेखन के विकास को भारतीय परिवेश में इतिहास-लेखन की प्रक्रिया में हुए महत्वपूर्ण परिवर्तनों के द्वारा समझा जा सके।
उन्होंने अभिलेखीय स्रोतों, पांडुलिपियों और इतिहास, कविता, जीवनी, भूगोल, विश्वकोशों, टिप्पणियों और संस्कृत कार्यों के महत्वपूर्ण अनुवादों के प्रकाशित ग्रंथों पर भी चर्चा की।
कार्यशाला में विशेषज्ञों ने छात्रों को पांडुलिपियों को समझने के तरीके, विभिन्न पांडुलिपियों की तुलना करने और पाठ्य मुद्दों को समझने जैसे विषयों से परिचित कराया।
प्रतिभागियों को भारत-फारसी इतिहासलेखन की विस्तृत श्रृंखला, बहुआयामी व्याख्याओं, सल्तनत काल के इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी के तारिख फिरोज शाही के इतिहास और बादशाह नामा की पांडुलिपियों, शाहजहाँ के शासनकाल के आधिकारिक इतिहास, मुगल चित्रों और सुलेख की विस्तृत श्रृंखला से परिचित कराया जाएगा।